Sunday , 29 November 2020

जंक फूड से बच्चों में बढ़ रहा मोटापा


कुछ वर्षों से भारत में भी बच्चों में मोटापा एवं अन्य बीमारियां तेजी से बढ़ता ही जा रही हैं. ये सारी बीमारियां मूल रूप से खानपान की आदतों एवं मोटापे के कारण पनप रही हैं. कुछ बीमारियां बच्चे मां-बाप से गर्भ में ही उपहार स्वरूप प्राप्त कर रहे हैं. गौर से विचार किया जाये तो इस प्रकार के रोगों के लिए जिम्मेदार है सही खानपान का न होना. अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों को उनकी मनपसंद टॉफी, कोल्ड ड्रिंक, आइसप्रीम आदि खाने को दे रहे हैं.

यह एक ऐसा उपाय है जिससे वे बच्चों पर अपना प्यार इजहार करना चाहते हैं या फिर उनसे अपना मनमाफिक काम करवाने का तरीका है. यदि बच्चा होमवर्क नहीं कर रहा हो या फिर खेलने की जिद्द कर रहा हो तो इस प्रकार के जंक फूड की सहायता लेने में मां-बाप तनिक भी नहीं हिचकते. वहीं अब जंक फूड से होने वाली बीमारियां गंभीर रूप धारण करने लगी हैं तो इनके विज्ञापनों पर रोक लगाने की मांग बढने लगी है.

अधिकांश बच्चे टी.वी. और कम्प्यूटर से जुड़े हैं. वे न तो खेल के मैदान में जाते हैं, न ही किसी प्रकार का व्यायाम करते हैं. पढ़ाई और टी.वी. यानी चारदीवारी के अंदर कैद बच्चे. तो फिर विज्ञापन इन बच्चों को केंद्रित कर ही क्यों न बनाया जाये, यह मानसिकता है विज्ञापनदाताओं की. वास्तविकता तो यह है कि बच्चों की मुहर किसी भी सामग्री को घर के अंदर प्रवेश दिला सकती है, खासकर घरेलू व दैनिक उपयोग का सामान. बच्चे तो कोरा कागज हैं, उन्हें हानि-लाभ का क्या पता? जिद कर बैठते हैं कि हमें इस ब्रांड की अमुक टॉफी, कोल्ड ड्रिंक वगैरह चाहिए और अभिभावक बिना कुछ सोचे-समझे उनकी मांग पूर्ति कर देते हैं.

लेकिन अब हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी. विदेशों में जंक फूड को लेकर बहसबाजी छिड़ गयी है. इनके विज्ञापनों पर रोक लगाने की पुरजोर मांग की जा रही है. जन-जागरूकता अभियान के तहत इनके अवगुण बताये-समझाए जा रहे हैं. आज पश्चिमी देशों का अंधानुकरण करने का हमारे देश में प्रचलन काफी बढ़ गया है. जरूरत है जंक फूड त्यागने की. खेलना कूदना, सुबह स्वच्छ वायु में टहलना, व्यायाम आदि को बच्चों की दिनचर्या में शामिल करना होगा. जन-जागरूकता अभियान चलाकर हर बच्चे को जंक फूड से होने वाले नफा-नुकसान के प्रति जागरुक करना चाहिए.

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