विदेशों में बस्तरिया इमली की चटकार : साधुराम दुल्हानी


जगदलपुर में एशिया की सबसे बड़ी इमली मंडी है. यहां से इमली दूसरे राज्यों में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी भेजी जाती है. दूसरे मुल्कों में जा रही बस्तर की इमली विदेशियों को अपने स्वाद से काफी लुभा रही है. इसका औसतन कारोबार 1000 करोड़ रूपये के आसपास है. बस्तर की आबोहवा इमली के लिए ज्यादा फायदेमंद है. यही वजह है कि हर साल इमली की बंपर पैदावार और कारोबार बस्तर में होता है. बस्तर में इमली की बड़ी तादाद में पैदावार होती हैं जिसके चलते यहां के व्यापारी बस्तर की इमली को दूसरे राज्यों में भेजते हैं.

इसकी क्वालिटी और रंग है, जो विदेशों मंे अपनी पहचान बनाए हुए हैं. यहां की इमली की मांग आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल (West Bengal) जैसे राज्यों में तो है ही, वहीं सालाना करीब 200 करोड़ के इमली का निर्यात श्रीलंका, मलेशिया, पाकिस्तान और वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में भी किया जाता है. हालांकि पड़ोसी देशों में जाने वाली इमली सीधे बस्तर वहां तक पहंुचती है. बस्तर के नारायणपुर से आने वाली इमली अपने बेहतर क्वालिटी के लिए विख्यात है तो लोहड़ीगुड़ा की इमली अपने रंग को लेकर लोकप्रिय है.

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वहीं दरभा की इमली गूदेदार और मीठे स्वाद की वजह से अन्य राज्यों के मुताबिक बस्तर की इमली को काफी ज्यादा पसंद किया जाता है. बस्तरिया इमली की मांग अन्य राज्यों में होने की वजह से स्थानीय व्यापारियों को इसकी कीमत अच्छी मिलने लगी है. वहीं दूसरे राज्यों के व्यापारी भी यहां आकर इमली खरीदने में काफी रूचि दिखा रहे हैं. यह न्यूनतम समर्थन मूल्य 2200 रूपये प्रति क्विंटल यानी 22 रूपये प्रति क्विंटल निर्धारित है. लेकिन इमली की मांग ऐसी है कि कई बार वनवासी व्यापारियों को समर्थन मूल्य से अधिक कीमत पर भी इमली बेच लेते हैं.

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बस्तर क्षेत्र में इमली का बंपर उत्पादन होने के कारण अब इमली से संबंधित विभिन्न संस्करण इकाइयां भी लगाई जा रही है. इमली के बीज और रेशे निकालकर चपाती बनाने का काम भी शुरू हो चुका है. यह कार्य मशीनों के जरिए किया जा रहा है. इससे महिलाओं का समय बचने के अलावा उन्हें मुनाफा भी अधिक मिल रहा है. कृषि विभाग द्वारा इमली के बीज और रेषे को निकालकर चपाती बनाने का प्रशिक्षण ट्राईफेड के क्षेत्रीय प्रबंधक पीके पंडा के मुताबिक 300 आदिवासी महिला समूहों को इमली चपाती बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है. प्रशिक्षण लेने के बाद महिलाओं ने इमली से जो भी उत्पाद बनाए इसकी मांग स्थानीय स्तर के साथ बाहर भी है.

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इसके अलावा बस्तर की इमली से बनाई जा रही खटटी-मीठी केण्डी तेजी से लोकप्रिय हो रही है, साथ ही ग्रामीणों को स्वरोजगार का एक अच्छा जरिया भी दे रही है.
वनोपज के संग्रहण से वनवासी ग्रामिणों के रोजगार के अवसर बढ़े है. वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने बताया कि देश में सर्वाधिक मुल्य की लघु वनोपजो की खरीदी करने वाला छत्तीसगढ़ राज्य प्रथम स्थन पर है. तमाम चुनौतियों के बावजूद नक्सल प्रभावित नारायणपुर एवं बीजापुर तथा सुकमा जिले में वनोपज संग्रहण केन्द्र खोले गये. बस्तर कमीश्नर द्वारा भी इन संग्रहण केन्दों को देखा. उन्होंने नारायणपुर जिले के महिला समूहों को स्टीकर तथा फुल झाडु बनाने के लिए प्रोत्साहित किया.

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