विश्व पर्यटन दिवस : मेवाड़ की पारंपरिक शिल्प कला

महाराणा मेवाड़ चेरिटेबल फाउण्डेशन, उदयपुर (Udaipur) विश्व पर्यटन दिवस के अवसर पर यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड टूरिज्म ऑर्गेनाइजेशन की इस वर्ष की ‘पर्यटन और ग्रामीण विकास’ विषयक थीम पर मेवाड़ में प्रचलित पारंपरिक शिल्प और शिल्प कला कौशल पर संक्षिप्त प्रकाश प्रस्तुत कर रहा है. फाउण्डेशन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी भूपेन्द्र सिंह आउवा ने इस अवसर पर बताया कि कोविड-19 (Covid-19) के प्रकोप से पर्यटन व्यवसाय पर इसका बुरा प्रभाव पड़ा है खासकर ग्रामीण पर्यटन पर. इसी कारण पर्यटन को पुनः विकसित करने के लिए हमें पारंपरिक शिल्प एवं कला पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है.

उदयपुर (Udaipur) मेवाड़ में कई तरह के हस्तकला उद्योग प्रचलित है जो प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पर्यटन से जुडे़ हुए है. जिनमें जड़िया (आभूषणों में रत्न जड़ने वाले कारीगर), कसारा (पीतल का कार्य करने वाले कारीगर), सिकलीगर (तलवारें-ढ़ालों के कारीगर), प्रजापत (कुम्हार – मिट्टी के बर्तन बनाने वाले) तथा इसी तरह सुथार, बुनकर, वारी, रंगरेज-छीपा, गांची, मोची, तेली, तम्बोली आदि राजमहल के आस-पास ही बसते हैं, इनमें कई दक्ष कारीगरों आदि का परिवार महाराणा उदय सिंह जी के साथ उदयपुर (Udaipur) स्थापना के समय से ही यहां बस गये थे. मेवाड़ के महाराणाओं द्वारा प्रचलित पारंपरिक कला, चित्रकला व कलाकारों को रियासत काल में संरक्षण प्रदान किया जाता था. पीढ़ी दर पीढ़ी कार्य करने वाले कलाकारों ने पारंपरिक कला कौशल को आज तक जीवित रख अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, किन्तु समय के साथ-साथ इनमें कई तरह के बदलाव देखें जा सकते है.

मेवाड़ की पारंपरिक शिल्प कला में कुछ इस प्रकार है:-

जड़िया: सोने, चांदी (Silver) , धातु, संगमरमर, कपड़े आदि पर रत्नों की जड़ाई का कार्य करते है. कुंदन और कई कीमती रत्नों को गहनों व अन्य कीमती सामानों में सावधानी से जड़ने, आकार देने, चमकाने का काम करते है. दक्ष कारीगरी से बहुरंगी रत्न-पत्थरों को अति सुन्दर तरीकें से गहनों में जोड़ कर उन्हें आकर्षक आकार देते है. उदयपुर (Udaipur) में इन कारीगरी के बाजार को जड़ियों की ओल के नाम से जाना जाता है, जहां आज भी कई पुश्तैनी कारीगर रत्न जड़ाई का कार्य करते है. भीनमाल का माल समुदाय महाराणा उदयसिंह जी के साथ उदयपुर (Udaipur) चले आये और यहीं बस गये.

कसारा: कसारा समुदाय के कारीगर कई पीढ़ियों से पीतल की धातु से घरेलु उपयोग के पारंपरिक बर्तन जिनमें थाली, लोठा, घड़े (चरु-चरवियां) आदि को बनाते है. ये कारीगर पीतल की शीट पर हथौड़े से पीट पीट कर बर्तनों को आकार देते है और उन्हें चमकाते है. इस कला में भट्टी का प्रयोग भी किया जाता है. उदयपुर (Udaipur) के कसारों की ओल में आज भी इस पारंपरिक कला को देखा जा सकता है तथा समय के अनुसार कहीं कहीं मशीनी प्रयोग भी देखा जा सकता है.

सिकलीगर: सिकलीगरों का काम मूल रूप से हथियारों का निर्माण करना तथा धारदार हथियारों को तेज करने का होता है. उदयपुर (Udaipur) में कई सिकलीगर परिवार रहते है. सिकलीगर तलवार, चाकू, भाले, ढ़ाल, खंजर आदि का निर्माण करते है. उदयपुर (Udaipur) में आज भी सिकलीगरों की दूकानों को पारंपरिक तरीकों से पहिये के माध्यम से हथियारों की धार तेज करते देखा जा सकता है. कहीं कहीं ये पहिये मशीन से तो कहीं आज भी पारंपरिक तरीके से चमड़े के बने बेल्ट से धार करने वाले पहिये को घुमाकर धार का कार्य किया जाता है.

प्रजापत: उदयपुर (Udaipur) में रहने वाले कुम्हार बम्बोरी गोत्र के हैं जिन्हें प्रजापत के नाम से भी जाना जाता है. महाराणा उदय सिंह जी के समय इन्हें चित्तौड़गढ़ से डबोक के पास डांगियो की टूस में लाकर बसाया और बाद में इन्हें उदयपुर (Udaipur) में लाकर बसाया. ये आज भी उदयपुर (Udaipur) के कुम्हारवाड़ा में बसते है. कुम्हार मिट्टी के उपयोगी बर्तनों का निर्माण करते है तथा साथ ही मंदिर व त्योहार में उपयोगी दीपक, धुपारने, कलश आदि का भी निर्माण करते है. रियासत काल में मुख्य प्रजापत को महलों से वार्षिक राशन और भत्ता मिलता था.

रियासत काल में ऐसे कई कलाकार, चित्रकार आदि उदयपुर (Udaipur) में महाराणाओं के संरक्षण में कार्य करते थे जिन्हें उनके पेशे के हिसाब से समुह में रखा जाता था और उनके निवास क्षेत्र को उन्हीं की पहचान के अनुसार नाम दिया जाता था जैसे कुम्हारवाड़ा, जड़ियों की ओल, कसारों की ओल आदि. वर्तमान समय में अब कुछ परिवार ही अपने पुश्तैनी कार्यों को कर रहे है. शहरी जीवन शैली में बदलाव के चलते ऐसे कई व्यवसाय बंद होने के कगार पर खडे़ है. कहीं कहीं आर्थिक स्थिति खराब होने पर ऐसे कारीगरों ने अन्य रोजगार का अपनाकर अपने पुश्तैनी कार्य को छोड दिया है.

Please share this news

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *