मेरे हाथों का रोना, कब मरेगा कोरोना

सुनील पंडित

मैं अभी न्यूज रूम में बैठा हूं. जहां एक कोने में टीवी चल रहा है, जिस पर देश-दुनिया की खबरें चल रही है. सामने हमारे बॉस बैठे है. गिनती के यहीं कोई 10 नंबर पर कुर्सी लगाकर मैं बैठा हूं. लगातार खबरें आ रही है और उसको एडिट करने का जिम्मा मेरे कंधों पर है. इस वक्त ये जिम्मेदारी मानो कोरोना से लडऩे वाले लड़ाके की तरह है. क्योंकि हर तरफ जो खबरें आ रही है और देख रहा हूं वो कोरोना और सिर्फ कोरोना से संबंधित ही है. कोई इस संकट में हॉस्पीटलाइज हुआ है तो खबर, कोई पीटा है तो खबर, किसी को राशन नहीं मिला है वो खबर, यहां तक की पेज के हर भाग में एक ही खबर, बस कोरोना. मैं इन्हीं तीन शब्दों को हर दिन 18 हजार से बार लिखता हूं. इतना कि अब मुझे भी खौफ होने लगा है. किराये के एक बंद कमरें में जब घुसता हूं तो मोहल्ले वाले जाग रहे होते है.

वो भी खिडक़ी से आज का अपडेट पूछते है. कोई पूछता है कोरोना के इस आतंक से कब मुक्ति मिलेगी. मैं हर एक पेज की खबरों को इसलिए ध्यान से पढ़ता हूं कि कोई खिडक़ी से पूछ ले तो अखबार आने से पहले सही-सही बता दूं. अब ये भी संकट है कि गलत बताया तो कई अग्रि परीक्षा में फेल हो जाऊंगा और मुझे फिर कोई नहीं पूछेगा. इसी डर ने रोज अखबार की तह में जाना सीखा दिया. हालांकि अखबार तो रोज पढ़ता हूं मगर सरसरी निगाहों से. मेरे कीबोर्ड की टीक-टीक हर दूसरा शब्द कोरोना के आसपास ही भटकता है. मानो मेरे हाथों के हर हिस्से में कोरोना महाशय फैल चुका है. जैसे उसकी गंध ने मेरे हाथों पर अपना साम्राज्य खड़ा कर दिया है. सपनों में तो कई बार मुझे ऐसा भी लगता है कि मुझे कोरोना वार्ड में ले जाया जा रहा है. मैं घसीटने वाले बेड पर लेटा हुआ हूं और सब मुझे क्रूर नजरों से देख रहे है. नीली थैली ओढ़े डॉक्टर (doctor) सब कुछ ठीक होने का आश्वासन देते जा रहे है और मैं घरवालों से मिलने की रट लगाए बैठा हूं.

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कई दिन हो गए है और मुझे आइसोलेशन वार्ड में रखा गया है. मैं फिर भी घरवालों से मिलने की नाकाम गुहार लगा रहा हूं. मैं बोल रहा हूं अरे कोई मरने से पहले मेरी आखरी इच्छा तो पूछ लो. कई दिनों के बाद आखरी वो घड़ी आई कि जिसका मुझे इंतजार था. सुबह दवाई देने के बाद एक डॉक्टर (doctor) मुझसे कह रहा है आज तुम्हें तुम्हारी आखरी इच्छा बताने का मौका मिलेगा. मैं पूछता हूं-क्या और वो चला जाता है. इसके जाने के बाद एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जिसके हाथ में पैन और कागज है वो मुझे गुरते हुए चला आ रहा है. उसने बैड पर ही वो रखते हुए कहा-ले मर बीमारी. वो ये भी कहता है कि तुम पत्रकार इसलिए भी बड़े जिद्दी टाइप के होते है. अगर घर में ही बैठे होते तो ये मुसीबत नहीं आती. मेरा गला चौक है और मैं ये भी नहीं बता पा रहा हूं कि हम भी आपकी तरह जनता की सेवा ही करते है.

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खैर रोते हुए कागज उठाया और पैन से लिखने लगा. सोच रहा हूं शुरूआत कहा से करूं. बहुत सारे विचार आते जा रहे है. ऐसे लग रहा है कि जैसे विचारों के कुएं में डूब गया हूं और आखरी ख्वाइश की एक बाल्टी कभी भर रही है और कभी खाली कर रहा हूं. सोच रहा हूं एक बार बांसुरी बजाने की इच्छा जाहिर कर दूं. फिर सोच रहा हूं अगर सिर्फ बांसुरी ही बजाऊंगा तो समाज को क्या मैसेज जाएगा. फिर धासूं आर्टिकल लिखने और उसे नाम सहित छापने की इच्छा लिखने लगा हूं. कई बार दोस्तों के साथ चाय पीने, उनके साथ घुमने, उसके साथ मस्ती करने का विचार भी आ रहा है. बुढ़ी नानी और बहन-भाई की चिंता भी सता रही है. अपने गुरुजी को दिया हुआ वचन याद आ रहा हैं कि-मैं मरते दम तक बांसुरी का साथ नहीं छोड़ूंगा.

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हर दिन सुबह कर्मचारी पूछने आ रहा है कि बोलो क्या है आखरी इच्छा और फिर एक दिन तय किया कि देश के नाम ऐसा लेख प्रकाशित करूंगा कि उसे दुनिया पढ़े. मैं लिख रहा हूं और हर बार कोरोना याद आ रहा है. सडक़ों पर परेशान भीड़ दिख रही है. भोजन के लिए मोहताज लोग हाथ फैलाए बैठे है. सडक़ें सूनसान पड़ी है. राशन की दुकानों, डेयरी और मंडी में लोग कतारों में खड़े है. लोग बाहर निकलने का बेसब्री से इंतजार कर रहे है. लिखते-लिखते थक गया हूं और फिर सो गया हूं. सुबह देखता हूं कि रात के सारे विचार एक अखबार में छपकर मेरे सामने पड़े है.

मैं इन शब्दों को गले लगाकर सिसकियां भर रहा हूं. ये सब सपने में देख रहा हूं और कमरे में मेरे बदन से पसीना-पसीना छूट रहा है. खबराहट हो रही है. फिर मेरी अचानक से नींद खुलती है और देखता हूं कि अभी मैं जिंदा हूं. मैं हंसकर परमात्मा को धन्यवाद दे रहा हूं और खुदा के सामने उठे हाथों को देख रहा हूं. सोच रहा हूं कि शायद मेरे हाथ कह रहे है कि कब मरेगा ये कोरोना और अब लौटेगी ये रौनक.

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