मैं भी टीम से बाहर होने पर असुरक्षित महसूस करता था : द्रविड़


मुम्बई . भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और मिस्टर भरोसेमंद के नाम से लोकप्रिय बल्लेबाज रहे राहुल द्रविड़ ने भी अपने करियर में खासा संघर्ष किया है. द्रविड़ ने कहा कि वह भी कई बार टीम से बाहर हुए हैं और तब उन्हें भी असुरक्षित महसूस होता था. पूर्व क्रिकेटर डब्ल्यू वी रमन के साथ बात करते हुए इस महान बल्लेबाज ने खुलासा किया कि 1998 में उन्हें एकदिवसीय टीम से बाहर कर दिया गया था क्योंकि उनका स्ट्राइक रेट धीमा था. उन्होंने कहा, ‘मेरे अंतरराष्ट्रीय करियर में ऐसे भी कई मौके आए, जब मैं अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा था. 1998 में जब मुझे एकदिवसीय क्रिकेट से बाहर कर दिया गया था. तब मुझे भी अपनी वापसी के लिए संघर्ष करना पड़ा था. मैं तब एक साल तक भारतीय क्रिकेट से बाहर रहा था. उस समय निश्चितरूप के मेरे अंदर भी असुरक्षा की भावना आई थी. मैं सोचता था कि क्या वाकई मैं एकदिवसीय क्रिकेट खेलने योग्य हूं भी या नहीं.’

इस पूर्व बल्लेबाज ने कहा, ‘मैं एक टेस्ट खिलाड़ी ही बनना चाहता था. मेरी कोचिंग टेस्ट खिलाड़ी वाली होती थी. तब हमें यही सिखाया जाता था कि गेंद पर ग्राउंड शॉट ही मारना है, उसे हवा में नहीं मारना. तब आपको चिंता होती है कि क्या आप एकदिवसीय में भी अपने को साबित कर पाएंगे.’ इस पूर्व कप्तान ने कहा, ‘जब हम युवा उम्र में क्रिकेट खेल रहे थे तब प्रतिस्पर्धा भी बहुत थी, इसके बाद भी असुरक्षा की भावना घर कर रही थी क्योंकि भारत में एक युवा क्रिकेटर बनना आसान नहीं था. तब हमारे जमाने में सिर्फ रणजी ट्रॉफी होती थी और भारतीय टीम थी.’

तब आईपीएल (Indian Premier League) जैसी कोई लीग नहीं थी और रणजी ट्रॉफी में भी काफी कम पैसा मिलता था. चुनौतियां भी कड़ी हुआ करती थीं और क्रिकेट चुनने के कारण बड़े स्तर पर पढ़ाई छोड़नी पड़ती है. मैं पढ़ाई में भी ठीक था और एमबीए या किसी और पेशेवार डिग्री को हासि कर सकता था पर मैंने क्रिकेट में कदम बढ़ाया पर अगर यहां कामयाब नहीं हो पाता तो फिर कुछ और करने लायक नहीं बचता. यही असुरक्षा का बड़ा कारण था.’ 1998 के बाद जब द्रविड़ ने एकदिवसीय प्रारुप में फिर से वापसी की, तो उन्होंने अपने अच्छे प्रदर्शन से टीम में अपनी जगह पक्की कर ली.

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