कोरोना से डरने की नहीं लड़ने की जरूरत : सनत कुमार जैन


कोरोनावायरस को लेकर सारी दुनिया भाई भयाक्रांत है. चीन में सबसे पहले हजारों लोगों की मौत हुई. उसके बाद इटली, अमेरिका, स्पेन, भारत सहित कई देशों में अभी तक 34000 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें अधिकांश मौतें बच्चों और बुजुर्गों की हुई है. इटली अमेरिका विकसित राष्ट्र में कोरोनावायरस का इलाज किस तरह किया जा सकता है. इसका उन्हें ना तो ज्ञान था. ना ही उन्होंने इस बीमारी के उपचार को लेकर जानने की कोशिश की. जिसके कारण अमेरिका और इटली में सबसे ज्यादा मौतें हुई.

दुनिया भर के अन्य देशों ने कोरोनावायरस के संक्रमण को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया है. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी. दुनिया के अलग-अलग देशों में कोरोना संक्रमण का फैलाव अलग-अलग तरीके से हुआ है. पिछले दो माह में कोरोनावायरस के कारण जो मौतें हुई हैं, उसकी जानकारी मिलने पर कई देशों ने अपने तरीके से निपटने के इंतजाम किए. उसमें वह सफल भी हुए हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति ने चीन में जब कोरोनावायरस फैला था. तब यह कह रहे थे, कि यह अमेरिका में नहीं फेलेगा. उन्होंने इसके लिए कोई इंतजाम नहीं किए. अमेरिका में जब कोरोनावायरस फैला, तब इस बीमारी से निपटने के तरीके और उपकरणों का वहां पर इंतजाम नहीं था. पर्याप्त संख्या में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं थे. जिसके कारण वहां बड़े पैमाने पर लोगों की मौत हुई. कुछ इसी तरह की स्थिति इटली की भी रही. लंदन में भारतीय उद्योगपति जीडी बिरला की मौत कहने को कैंसर से हुई थी. लेकिन सही मायने में डॉक्टरों (Doctors) द्वारा मलेरिया डीसी की जानकारी नहीं होने के कारण तेज बुखार आने से उनकी मौत हुई थी. लंदन में मलेरिया के मरीज नहीं होते थे. जिसके कारण वह मलेरिया डायग्नोसिस नहीं कर पाए थे.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) ने इस महामारी (Epidemic) से बचाव करने के लिए लॉक डाउन करने का सुझाव सारी दुनिया के देशों को सुझाया था. सभी देशों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization) द्वारा दी गई सलाह का अपने अपने देश की स्थिति के अनुसार उसका पालन कराया. जिन देशों में लॉक डाउन सही तरीके से लागू हुआ. वहां पर कोरोनावायरस से संक्रमित मरीजों की संख्या सबसे कम है. जापान ने लॉक डाउन लागू करने के लिए नमस्ते संस्कृति बाहर निकलने पर मास्क लगाने और हाथों की सफाई पर ध्यान देकर कौराना पर नियंत्रण पाया. उल्लेखनीय है कि जापान में ट्रेन, बसें, रेस्टोरेंट, क्लब, हाउस, थिएटर, मेट्रो, औद्योगिक एवं व्यापारिक गतिविधियां पूर्व की तरह ही संचालित हो रही हैं. दुबई और हांगकांग में भी कोरोनावायरस के संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए जो उपाय किए. वह पूर्णता सफल रहे. संक्रमण से बचने के लिए वहां के लोगों ने खुद अपने आप को सुरक्षित किया.

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भारत में अमेरिका के राष्ट्रपति फरवरी माह में 2 दिन की यात्रा पर थे. मार्च के दूसरे सप्ताह तक भारत के प्रधानमंत्री द्वारा कहा जा रहा था कि कोरोनावायरस का कोई असर भारत में नहीं होगा. अमेरिका के राष्ट्रपति भी कोरोनावायरस को लेकर यही कह रहे थे. 11 मार्च को कोरोनावायरस के कारण कर्नाटक के कुलवर्गी में जब पहली मौत हुई. उसके बाद भी भारत सरकार (Government) ने कोई विशेष प्रयास नहीं किए उल्टे दवाइयां और मास्क इत्यादि विदेशों में निर्यात होते रहे 16 मार्च को कोरोनावायरस के कारण मध्यप्रदेश विधानसभा का सत्र जब स्थगित किया गया.. तब इसको राजनीतिक कारणों से सत्र स्थगित करने का कारण बताया गया लोकसभा (Lok Sabha) का सत्र 22 मार्च तक चलता रहा, क्योंकि मध्यप्रदेश विधानसभा सत्र स्थगित किए जाने को राजनीतिक मुद्दा बनाया गया था. इसी बीच जब लगातार कोराना संक्रमण से मरीजों की संख्या बढ़ना शुरू हुई. उसके बाद आनन-फानन में 22 मार्च को जनता कर्फ्यू (Public curfew) लागू किया गया.

जनता कर्फ्यू (Public curfew) की सफलता को देखते हुए बिना सोचे समझे 21 दिन का लॉक डाउन लागू कर दिया गया. रेल और बसों को तुरंत बंद कर दिया गया. इसके कारण भारत में अफरा तफरी का माहौल बन गया. भारत में हजारों लोग अन्य प्रांतों से आकर अन्य प्रांतों के शहरों में काम करते हैं. वही मुंबई (Mumbai) , दिल्ली, चेन्नई, अहमदाबाद (Ahmedabad), सूरत (Surat), बड़ौदा, बेंगलुरु (Bengaluru), हैदराबाद, इत्यादि में लाखों लोग अन्य प्रदेशों से आकर यहां पर मजदूरी छोटा-मोटा व्यवसाय टैक्सी चालक इत्यादि के रूप में काम करते हैं. लॉक डाउन बिना सोचे समझे लागू कर देने के कारण बाहर से आए हुए लाखों लोगों को दूसरे दिन भोजन भी नहीं मिला. उल्टे पुलिस (Police) के डंडे मिले. उन्हें जहां रह रहे थे. वहां से भगाया गया. जिस तरह का भय फैलाया गया. उससे वह जान बचाने के लिए पैदल ही अपने घरों में जाने के लिए बीवी बच्चों के साथ निकल पड़े. जिन कारणों से लॉक डाउन लागू किया गया था, वही पूरी तरह फेल हो गया.

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भारत जैसे देश में कोरोनावायरस से डरने के स्थान पर उससे लड़ने की जरूरत थी. पिछले 3 माह में कोरोनावायरस को लेकर जो जानकारी आई है. उसके अनुसार कोरोनावायरस का संक्रमण 14 दिन के अंदर होता है. कोरोनावायरस 3 दिन तक गले के अंदर विकसित होता है. उसके बाद यह स्वांस नली के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है. जिन लोगों के फेफड़ों में संक्रमण हो चुका होता है. उनका वेंटिलेटर के माध्यम से ऑक्सीजन पहुंचा कर इलाज किया जाता है. भारत में राजस्थान केरल के मेडिकल कॉलेज में फेफड़ों तक पहुंच गए कोरोनावायरस से संक्रमित मरीज को एचआईवी मलेरिया तथा पेरासिटामोल से डॉक्टरों (Doctors) ने सफलता पूर्वक ठीक किया है.

भारत में इस तरह के संक्रमण से बचाव के इलाज पहले से ही मौजूद है. थ्रोट इनफेक्शन, गले की खराश होने गरम पानी में नमक डालकर गरारे करने से या हल्दी डालकर वायरस के संक्रमण को दूर किया जा सकता है. गरम पानी पीकर वायरस को आसानी से बाहर निकाला जा सकता है. लॉक डाउन के पहले लोगों को नमक के पानी के गरारे करने ठंडी, चीजें नहीं खाने लोगों से हाथ नहीं मिलाने बातचीत के दौरान आवश्यक दूरी बनाए रखने मास्क अथवा बातचीत के दौरान मुंह में कपड़ा रखकर उपयोग करने की सलाह देकर आम आदमी को कोरोनावायरस के फैलाव से सजग किया जा सकता था. जो नहीं किया गया घबराहट में सरकार (Government) ने 21 दिन का लॉक डाउन लागू करके ट्रेन बसें और बाजार बंद करके लोगों को उल्टे भयभीत कर दिया बाहर से आए हुए लोग इस बात पर घबरा गए कि उन्हें अपनी जान बचाने के लिए यहां से भागना होगा अन्यथा वह भूखे ही मर जाएंगे.

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सरकार चाहती तो लाकडाउन लागू करने के पहले राज्य सरकारों से संपर्क कर स्कूलों, धर्मशाला इत्यादि में बाहर से आए हुए मजदूरों और पटरी पर कारोबार करने वालों को भोजन की व्यवस्था और रुकने की व्यवस्था कराकर लॉकडाउन (Lockdown) को बेहतर ढंग से लागू कर सकता था. सरकार (Government) की जल्दबाजी से आज प्रत्येक राज्य के लाखों लोग भेड़ बकरियों की तरह झुंड में अपने अपने घरों की ओर चल पड़े हैं. लाखों की संख्या में लोग अपने बीवी बच्चों के साथ पैदल भाग रहे हैं. जिन लोगों को ट्रक या अन्य साधन मिले. उनमें उन्हें भेड़ बकरियों की तरह उन्हें ले जाया जा रहा है. जगह-जगह पर पुलिस (Police) उनके साथ अमानवीय व्यवहार कर रही है. सरकार (Government) और उसके अधिकारियों द्वारा तुगलकी फरमान के द्वारा लॉक डाउन लागू कराने के जो प्रयास किए जा रहे हैं. वह पूरी तरह अमानवीय और देश को अर्थ संकट में डालने वाले हैं. 21 दिन तक पूरे देश की आर्थिक सामाजिक और पारिवारिक गतिविधियों पर रोक लगाने के क्या दुष्परिणाम होंगे. इस पर भी सरकार (Government) और उनके अधिकारियों का ध्यान नहीं है. यह बड़ी चिंता का विषय है.

कानून का पालन तभी हो सकता है. जब उसका पालन करना संभव हो. गरीब जो रोजी रोटी के लिए अपने घरों से चलकर हजारों किलोमीटर दूर खुले आसमान पर चल रहे थे. उनके साथ जानवरों की तरह व्यवहार होना ही लाक डाउन को विफल बना रहा है.

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