2020 की वैश्विक मंदी से सारी दुनिया के देशों में घबराहट : सनत जैन


2020 की आर्थिक मंदी को लेकर सारे दुनिया के देशों में घबराहट फैल गई है. फौरी तौर पर कोरोना (Corona virus) को आर्थिक संकट का कारण माना जा रहा है. जबकि कोरोना (Corona virus) आर्थिक बदहाली का, तेजी से फैलाने का एक कारण हो सकता है. आर्थिक मंदी का सबसे बड़ा कारण सारी दुनिया में पिछले डेढ़ दशक में कर्ज का भारी बोझ, आम आदमी, कारोबारी जगत, कम्पनियों, नगरीय संस्थाओं तथा सरकारों के कर्जदार हो जाते है. संकट की इस घड़ी में किसी भी देश की अर्थ-व्यवस्था कर्ज के बोझ से उत्पन्न स्थिति का सामना करने की स्थिति किसी देश की नहीं है. सारी दुनिया के देशों में आर्थिक मंदी के कारण हाहाकार मचा हुआ है.

वैश्विक व्यापार संधि के बाद दुनिया के सभी देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते कायम हुए. विश्व बैंक (Bank) ने कर्ज लेकर विकास करने का जो फार्मुला दिया था. उसी फार्मुले में फंसकर आज सारी दुनिया आर्थिक मंदी का शिकार है. वैश्विक न्यूज एजेंसी ने दुनियाभर के 41 अर्थ-शास्त्रियों से मौजूदा मंदी के बारे में सर्वे किया. सर्वे में अर्थ-शास्त्रियों ने माना है, दुनियाभर के शेयर बाजारों की गिरावट ने अर्थतंत्र को अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया है. सारी दुनिया के कारपोरेट जगत और बड़ी – बड़ी कम्पनियों में 75 फीसदी पूंजी बैंकों की कर्ज में फंसी है. यह राशि वसूल नहीं हो पा रही है.

शेयर मार्केट की गिरावट से वित्तीय संस्थान खोखले हो गए हैं. नगदी का भारी संकट पैदा हो गया है. कर्ज का बोझ नागरिकों, स्थानीय संस्थाओं तथा सरकारों पर पिछले 15 वर्षों में तेजी से बढ़ा है. कर्ज की वसूली नहीं हो पा रही है. जिसके कारण दुनियाभर की अर्थव्यवस्था थम गई है. 2020 की आर्थिक मंदी कब तक चलेगी. इसका अनुमान लगाना भी अर्थशास्त्रियों के लिए संभव नहीं रहा है. इससे समझा जा सकता है कि सारी दुनिया के देश कितने बड़े आर्थिक संकट में फंस गए है. अमेरिका में कारपोरेट सेक्टर पर अमेरिका की जीडीपी के मुकाबले 75 फीसदी का कर्ज है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की रिपोर्ट में सारी दुनिया के देशों की अर्थव्यवस्था तेजी के साथ गिर रही है. सारी दुनिया के देशों के कारपोरेट जगत ने पिछले एक दशक में बड़े पैमाने पर कर्ज लिया है.

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1980 के बाद से कर्ज का बोझ कारपोरेट जगत पर बढ़ना शुरु हुआ था. 2004 के बाद कम ब्याज दर पर ॠण मिलने से कर्ज का बोझ बढ़ता ही चला गया. कर्ज चुकाने के लिए कारपोरेट ने वित्तीय संस्थाओं से कर्ज लिया. जो वह नहीं चुका पा रहे हैं. भारत जैसे देश में 2004 के पहिले व्यक्तिगत ॠण 0 था. व्यवसायिक कर्ज की सीमा कम थी. केन्द्र सरकार (Government) एवं राज्य सरकारों पर बहुत कम कर्ज था. 2004 के बाद से भारत सहित दुनिया भर के सभी देशों में आसानी से ॠण मिलना शुरु हुआ. उसके बाद सभी सेक्टर में मांग बढ़ी. इस मांग को पूरा करने के लिए कारपोरेट ने बड़ी तेजी के साथ बहुत सारा कर्ज लिया. मांग कम होने के बाद बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के माध्यम से जो ॠण दिए गए थे. उनकी वसूली नहीं हो पा रही है. पिछले 15 वर्षों में भारत जैसे देशों में धन का प्रवाह तेजी से बढ़ा था.

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केन्द्र, राज्य सरकारों ने तरह-तरह के टेक्स एवं शुल्क लगाये. स्थानीय संस्थाओं, राज्य सरकारों तथा केन्द्र सरकार (Government) ने भी बड़े पैमाने पर वित्तीय संस्थाओं ने विकास कार्यों तथा योजनाओं के लिये सीमा से अधिक कर्ज लिया. पिछले वर्षों में मांग घटने के साथ ही केन्द्र एवं राज्य सरकारों की आय में हर साल जो वृद्धि हो रही थी, वह अब थम गई है. नगरीय संस्थाओं के खर्च बढ़ गए, वहीं राजस्व में कमी आने लगी है. आम आदमी के ऊपर भी कर्ज का भारी बोझ है. आय से अधिक उस पर कर्ज की किस्तों का बोझ बढ़ गया है. इस कारण बड़ी तेजी के साथ मांग घटी. कोरोना (Corona virus) के कारण आर्थिक गतिविधियों के थम जाने से दुनियाभर के देशों के बीच आर्थिक संव्यवहार की जो चेन बनी थी. वह अब टूट गई है. जिसके कारण दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था में कब सुधार होगा. इसका अनुमान लगाना भी अर्थशास्त्रियों के लिए संभव नहीं रहा.

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2004 के बाद से दुनियाभर के देशों में सभी सेक्टरों में बड़ी तेजी के साथ मांग बढ़ी थी. जिसके कारण दुनिया भर के सभी देश आर्थिक दृष्टि से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे. पिछले 3 वर्षों में बड़ी तेजी के साथ मांग घट रही थी. जिसके कारण आर्थिक संकट शुरु हो गया है. कोरोना (Corona virus) के कारण अब मांग और आपूर्ति एक तरह से थम गई है. चीन पिछले 2 माह से कोरोना (Corona virus) की समस्या से जूझा रहा था. अब सारी दूनिया के देशों में कोरोना (Corona virus) के कारण आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियॉं थम गई है. कर्ज का बोझा होने से नई संभावनायें भी खत्म हो गई है. ॠण लेने और ॠण देने की स्थिति में नहीं होने से अब सारी दुनिया के देश आर्थिक रुप से बदहाली की स्थिति में पहुंच गए है.

2015 तक सारी दुनिया के देशों में पूंजीवादी व्यवस्था अपने चरम रुप में पहूंच चुकी थी. चूंकि अब पूंजी ही बाजार में नहीं है. ऐसी स्थिति में आर्थिक विकास का जो सपना सारी दुनिया देख रही थी. वह सपना अब पूरी तरह टूट चुका है. सारी दुनिया के देशों में अब आम आदमी अपने जीवन-यापन की प्रशासनिक जरुरतों के संकट से जूझ रहा है. ऐसी स्थिति में आर्थिक मंदी के सबसे बुरे दौर से निपटने के लिए सभी को अपने आपको तैयार करना होगा.

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